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मुंबई फैमिली डेथ मिस्ट्री: तरबूज में मिला चूहे मारने का जहर, FSL रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

मुंबई: पायधुनी में परिवार के चार लोगों की मौत की वजह चूहा मारने वाला जहर खाने से हुई थी। कलीना फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट में मृतकों के विसरा और तरबूज में जिंक फॉस्फाइड रसायन पाया गया है। यह बेहद जहरीला रसायन है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से चूहों और छछूंदरों को मारने के लिए किया जाता है। गुरुवार को 11 दिन बाद आई फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट से यह तो साफ हो गया कि चारों की मौत चूहे मारने वाली दवा के कारण हुई, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि तरबूज में डालकर यह दवा किसी और ने खिलाई थी, गलती से खाई गई, या परिवार के मुखिया ने पहले परिवार को खिलाकर बाद में खुद आत्महत्या की? पुलिस अब इसी दिशा में जांच को आगे बढ़ा रही है।

दोनों में जिंक फॉस्फाइड के अंश
FSL सूत्रों ने बताया कि मृतकों के विसरा और तरबूज, दोनों में जिंक फॉस्फाइड के अंश मिले हैं। यह आमतौर पर पाउडर के रूप में होता है और शरीर के अंदर पहुंचते ही बेहद जहरीली फॉस्फीन गैस बनाता है। तरबूज में भी यही रसायन मिला है। यानी तरबूज में इसे मिलाकर खाया गया। जैसे ही जिंक फॉस्फाइड पेट में जाता है, फॉस्फीन गैस सीधे फेफड़ों व अन्य अंगों पर असर करती है।

मरीज को बचाना मुश्किल
मरीज को बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है, क्योंकि इस गैस को शरीर से निकालना संभव नहीं होता। कुछ मात्रा पेट में बची रह जाए तो उल्टी के जरिए उसका कुछ हिस्सा बाहर निकल सकता है, लेकिन गैस बनने के बाद स्थिति गंभीर हो जाती है। इसके असर से शरीर का ऑक्सीजन सिस्टम प्रभावित होता है और व्यक्ति की मौत हो जाती है।

FSL रिपोर्ट के बाद अगला सवाल: हत्या, हादसा या आत्महत्या?
एफएसएल की रिपोर्ट में मृतकों के शरीर और तरबूज के नमूनों में जिंक फॉस्फाइड (चूहा मारने की दवा) पाए जाने की पुष्टि हुई। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस अब उन रिश्तेदारों से दोबारा पूछताछ करेगी, जो घटना वाली रात डिनर में शामिल हुए थे। पुलिस जानने की कोशिश कर रही है कि खाने या तरबूज में जहर किसने मिलाया। क्या अब्दुल्ला मानसिक तनाव से गुजर रहे थे, जिसकी वजह से उन्होंने यह कदम उठाया, या परिवार की किसी से दुश्मनी थी। सूत्रों के अनुसार, पुलिस परिवार के कॉल रिकॉर्ड, सोशल मीडिया गतिविधियों और कुछ महीनों के घटनाक्रम को खंगालने की तैयारी में है।

साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी में दिमाग की जांच
किसी व्यक्ति की मौत आत्महत्या थी, हादसा था या फिर हत्या, जब यह साफ नहीं हो पाता है तब जांच एजेंसियां (पुलिस या विशेष टीमें) एक खास तकनीक का सहारा लेती हैं, जिसे साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी कहा जाता है। इसे साइकेट्रिक अटॉप्सी या फॉरेंसिक साइकोलॉजिकल अटॉप्सी भी कहा जाता है। यह पारंपरिक पोस्टमार्टम की तरह शरीर की नहीं, बल्कि मृत व्यक्ति के ‘दिमाग और मानसिक स्थिति’ की जांच के तौर पर मानी जाती है।

‘माइंड का पोस्टमॉर्टम’ से खंगालते हैं जन्मकुंडली:
साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी में पुलिस मृतक के मेडिकल रिकॉर्ड, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी, सोशल मीडिया गतिविधियां, वाट्सएप-इंस्टा समेत अन्य मेसेजिंग एेप चैट, कॉल डिटेल्स और परिवार, रिश्तेदारों, पड़ोसियों व दोस्तों के साथ इंटरव्यू कर उसका मृतक के साथ लिंक का विश्लेषण करती हैं।

Chief Editor – Yusuf Patel

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